Saturday, 23 April 2011

कुछ अफ़साने दिल के.....

बीत गए वो दिन जब तेरी याद में बैठकर रोया करते थे...
अब तो आंसू भी निकलते हैं
अपना रास्ता पूछ कर...




हमारी ज़िन्दगी ताश के पत्तों की तरह बिखर गई...
ना उसे समेट पाए ....
और ना ही सजा पाए... 




ऐ-ज़ालिम ऐसे ना जा हमे तनहा अकेला छोरकर 
तेरी याद ना जीने देती है...
ना मरने देती है..
तू कहती है मुझे भूल जा...
अरे कैसे अलग करूँ इस दिल को...
जिसके हर एक धरकन में तू बस्ती है.


बस यही अर्जियां मैं अपने खुदा से दिन में सौ बार करता हूँ 
तेरी आखों में ख़ुशी...
और होठों पे हशी की दुआ करता हूँ.
अरे हमारा क्या है हम तो फकीर हैं..
बस अगले जनम फिर से तेरे आशिक बन्ने की दुआ करता हूँ.

वक़्त के नाजुक लम्हों में साथ छोरा तुमने...
सपने दिखाए साथ जीने के, आज तनहा छोरा तुमने...
ऐक वो भी दौर था ऐक ये भी दौर है...
विश्वास के दामन से बन्धे थे वो डोर..
पर किसे पता था उसकी गाठें इतनी कमजोर हैं... 

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