Monday, 12 December 2011

"ज़िन्दगी की राहों पर..."



वो निश्चल भावना तुम्हारी
          जीत मेरा मन गयी
जला के मन मंदिर में जयोति
          वो प्रीत मेरी बन गयी

मैं प्यार का सागर बना
          तू लहर मेरी बन गयी
मैं गीत बना धरा पर
          तू संगीत मेरी बन गयी

ज़िन्दगी की राहों में हर
          खवाब टूटने लगे
पर तुझे देख खवाब सजाना
          रीत मेरी बन गयी

तुझ संग जीने-मरने की कसमें
          मैं रोज खाया करता था
पता नहीं चला मुझे कब
          तू अतीत मेरी बन गयी !!!

2 comments:

  1. ... बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति है ।

    संजय भास्कर
    आदत....मुस्कुराने की
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद संजय जी...
    हमे बेहद खुशी हुई की आपको हमारी रचना पसंद आई.

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